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सतविन्द्र राणा ' बाल ': काम देश के आएं

                
                                                         
                            जन- जन का होता हित जिसमें,
                                                                 
                            
ऐसी बात चलाएँ
जन गण मन से देश बने यह,
काम देश के आएँ ।

भूखे पेटो को रोटी का,
अधिकार दिलाना है
हर मानुष का इक दूजे से,
बस प्यार बढ़ाना है
मत के भेदों से मन भेदी,
कहीं न बढ़ने पाएं
जन गण मन से देश बने यह,
काम देश के आएं।

गंगा जैसी पावन कितनी,
मिली हमें जलधारा
जिसकी निर्मलता को छीना,
कब है सही विचारा
हर नदिया हो फिर से निर्मल,
श्रेष्ठ सोच अपनाएं,
जन गण मन से देश बने यह
काम देश के आएं।

हरियाली पर घात किए हैं,
वन जीवन निपटाया
धूप बढ़ी है पूर्ण भूमि पर,
जिसने खूब तपाया।
वन जीवन के संरक्षण को,
आगे कदम बढ़ाएं।
जन गण मन से देश बने यह
काम देश के आएं।

सुंदर धरती होगी तो यह,
राष्ट्र बनेगा उन्नत
और चिरंतन संस्कृति धारण,
कर देखेंगे जन्नत
वसुधा को परिवार मानकर,
सबको गले लगाएं।
जन गण मन से देश बने यह,
काम देश के आएं।
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2 महीने पहले

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