काव्य : अंतस् की छवि
शीर्षक : देखे ये मन
(३)
पहली पतग बालाओं की निश्शब्द ध्वनि
मोह-मिलन का मधुर गीत
पहिला स्मित मुकुल पर विवसन गात
आरंभिक बयारि के परस से
सिहरती करती रहती विहार
मधुवन में मैं खंडित-हार
शुक्तिमणि सी मैं निसङ्ग
बहुविध अनुभाव से देखती विचारती
तुम मिले अचानक
रुक गई मैं तुम्हें देखकर
खुद ही नजर अपलक सी थमी
बिखरी निगाह खिंच कर अंतस् को चकित किया
समर्पित किये प्राण इक दूसरे को
कामना से जीवन हो गया इक-दूसरे का
जो दूर थी; खिंच आई करीब
ज्यूँ हुई मैं अपनी ही नजर में
✍🏿 सतीश शेखर श्रीवास्तव “परिमल”
सिंगरौली (मध्यप्रदेश)
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