शीर्षक : अंदाजे बयां (७)
बुरा अच्छा जिस बुराई पर, अच्छाई भी धोखा खाया
ऐसी नेकी किस काम की, जिस पर गर्दन कट जाय।
वैसे तो हर देश है, धन उधार का अनुकांक्षी
देश अपना ऐसा नहीं, रख दें गहन अपनी भूपांक्षी।
विधा से ही कार्य है, अपना तो श्रीमान्
क्या कोयले की कोठरी, या हो सोने की खदान।
उसकी समझ से हुई, शायद हमसे कोई भूल
भौंरे की रंगत उड़ी, जब कुम्हलाये फूल।
जिसने जीवन भर किये, ऊँचे शिखर की तलाश
कंगूरे पर लटकी मिली, उसकी ही लाश।
इक दिन कुछ ऐसा लगा, स्वर जादू है संगीत
आँधियों पर हमने सुने, शहनाईयों के मीठे गीत।
- सतीश शेखर श्रीवास्तव “परिमल”
नवजीवन विहार से.नं. ४, विन्ध्यनगर
सिंगरौली (मध्यप्रदेश)
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