जूझता रहा मन रोज़ मेरा
सोच के उस दायरे से,
उस पार तुम हो और
इस पार ,मैं ख़याल तन्हा।
बेचैनी जैसे लहरे लिए हो
उम्मीद के छोटे जज़ीरे से
उस किनारे तुम हो और
इस किनारे,मैं द्वीप तन्हा
हवाएं गुज़री ना बहारें लिए
भँवरों के क़ाफ़िले से
उस बाग तुम हो और
इस बाग,मैं भँवरा तन्हा
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