ये कहना ज़रा सा भी मुश्किल नहीं है,
मोहब्बत में सब कुछ तो हासिल नहीं है।
धड़कता नहीं है किसी के लिए जो,
वो पत्थर है पत्थर कोई दिल नहीं है।
मैं अपना उसे कैसे कह दूँ कभी जो,
ग़म-ओ-शाद में मेरे शामिल नहीं है।
मुझे जिसने उल्फत के लायक न समझा
वो मेरी मोहब्बत के काबिल नहीं है।
शब-ए-हिज्र में रात भर जागती है
मगर मेरी मानिंद बिस्मिल नहीं है।
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