वक़्त थोड़ा है मगर इतना तो कर सकता हूँ।
दो घड़ी और तेरे पास ठहर सकता हूँ।
चाँदनी रात है बाहों में मुझे तू भर ले,
सुब्ह मैं ओस की बूंदों सा बिखर सकता हूँ।
आसमां में हूँ मगर पाँव नहीं उखड़े हैं,
जब भी चाहूँ मैं धरातल पे उतर सकता हूँ।
दश्त-ओ-सहरा की ही तस्वीर है राह-ए-उल्फत,
लोग गुज़रे हैं कई मैं भी गुज़र सकता हूँ।
सावित्री बन के मेरे साथ रहोगी गर तुम,
ज्योतिबा हो के मैं दुनिया में सँवर सकता हूँ।
- सतीश बोरकर
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