आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

वक़्त थोड़ा है

                
                                                         
                            वक़्त थोड़ा है मगर इतना तो कर सकता हूँ।
                                                                 
                            
दो घड़ी और तेरे पास ठहर सकता हूँ।

चाँदनी रात है बाहों में मुझे तू भर ले,
सुब्ह मैं ओस की बूंदों सा बिखर सकता हूँ।

आसमां में हूँ मगर पाँव नहीं उखड़े हैं,
जब भी चाहूँ मैं धरातल पे उतर सकता हूँ।

दश्त-ओ-सहरा की ही तस्वीर है राह-ए-उल्फत,
लोग गुज़रे हैं कई मैं भी गुज़र सकता हूँ।

सावित्री बन के मेरे साथ रहोगी गर तुम,
ज्योतिबा हो के मैं दुनिया में सँवर सकता हूँ।
- सतीश बोरकर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर