भूमि यदि उबड़-खाबड़ हो,
तो उसे समतल किया जाता है।
कंकड़, पत्थर, खरपतवार को,
चुन-चुन कर निकाल लिया जाता है।
खाद और उर्वरक की ताकत से,
मिट्टी को पाला-पोसा जाता है।
फिर मेघों की अनुकंपा पाकर,
उसमें जीवन का बीज बोया जाता है।
पर बीज बोने से पहले,
कृषक को पूर्ण आभास होता है।
फल कौन सा आएगा इस शाख पे,
इसका उसके मन में अटूट विश्वास होता है।
वो करता है उसका रक्षण-पोषण,
ज़ब विपदा का साया मंडराता है ।
जिससे केवल कल्याण और लाभ हो,
किसान वही बीज लगाता है।
पर हम...
जीवन के इस धरातल में,
उबड़-खाबड़ मन की माटी पर,
कंकड़, पत्थर व संशय के खरपतवार को,
साफ किए बिना ही,
कर्मों के बीज बो रहे हैं,
इच्छाओं की खाद दे रहे हैं।
फिर जब वह अंकुर वृक्ष बनता है,
और कर्मों का फल सामने आता है।
तब जाकर हमें भान होता है,
कि हमने क्या बोया था!
जिंदगी में दुख का यही मूल कारण है,
और बुद्ध की वाणी में इसका सुंदर निवारण है—
कि आओ,
उस कुशल किसान की भांति,
पहले अंतर्मन की भूमि समतल करें।
राग, द्वेष और अहंकार के पत्थरों को,
आत्मज्ञान से विदा करें।
मैत्री और करुणा की पावन खाद दे,
सजगता के नए बीज बोएं।
फिर प्रज्ञा की अमृत वर्षा होगी,
मोह, लोभ और क्रोध का क्षय होगा,
तब यह जीवन, शाश्वत सुखमय होगा।
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