लोगो की तरह राह भटक कर नहीं मिलता ।
यह सत्य कभी झूठ के दर पर नहीं मिलता ।
अब नाम तुम्हारा लिखूँ तो किस पे लिखूँ मैं,
संसार में तो कुछ भी अनश्वर नहीं मिलता ।
सूरज यहीं कहता है हमें आँखें दिखा के,
कहते हो अँधेरा है मुझें पर नहीं मिलता ।
कोई है सिकन्दर यहाँ कोई है कलन्दर,
इक सा सभी लोगो को मुकद्दर नहीं मिलता ।
दुःख दर्द कपट लोभ जलन क्रोध असंतोष,
इंसान के अंदर है ये बाहर नहीं मिलता ।
दिन रात जहाँ इश्क की होती थी गुटरगूँ,
उन शाखों पे अब श्वेत कबूतर नहीं मिलता ।
मंजिल का पता वादियाँ देती है सफर में,
पगडंडियों में मील का पत्थर नहीं मिलता ।
-सतीश बोरकर
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