गमों के दौर में दुनिया खटकने लगती है।
बुझे चराग के मानिंद लगने लगती है।
जरूरतों के मुताबिक ही सोचना अच्छा,
जो बाढ़ आए तो नदिया बहकने लगती है।
दहकते शोले को आंधी बुझा नहीं सकती,
हवा को रोकें तो ये आग बुझने लगती है।
घड़ी उदासी की है एक बर्फ की सिल्ली,
हँसी की आँच जो पाए पिघलने लगती है।
गुलाब की किसी पत्ती को छूने भर से ही,
हवा में इश्क की खुशबू बिखरने लगती है।
- सतीश बोरकर
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