आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बदन टूटने तक कमाता रहूँगा

                
                                                         
                            बदन टूटने तक कमाता रहूँगा
                                                                 
                            
किसी के लिए घर सजाता रहूँगा

वो इल्जाम देते है देते रहेंगे,
मैं चुपचाप रिश्ता निभाता रहूँगा।

भुलाने न दूँगा तवारीख़ अपनी
कहानी पुरानी सुनाता रहूँगा

सदाक़त की तारीफ़ में दुनिया वालों,
लबों से सदाएँ उठाता रहूँगा।

तपिश में मिलेगा किसी को तो आराम
मैं बारिश में पौधे लगाता रहूँगा।

किसी के भी हिस्से न आए मेरा ग़म,
सफर में सदा मुस्कुराता रहूँगा।
- सतीश बोरकर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर