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पतझड़ से फिर क्या घबराना

                
                                                         
                            पतझङ अंत नहीं जीवन का,
                                                                 
                            
बस मन की एक कहानी है।

गिरे जहां दो सूखे पत्ते,
ठहरा सा कुछ पानी है।

पतझड़ की पीङा के पीछे
अंकुर की छीपी कहानी है।

टुटे पत्ते सीखा गए कि,
त्याग ही श्रेष्ठ निशानी है।

खाली शाखा बता रही है,
ज़िन्दगी आनी जानी है।

बिखरे पत्तों के झुरमुट में,
पल्लवित पुष्पों की रवानी है।

यदि यकीं है मधुमास पर,
पतझड़ से प्रीत पुरानी है।

पतझड़ बिन रचना कब सम्भव,
कलम जख्मों की दीवानी है।

पतझड़ से फिर क्या घबराना,
जो नये सपनों की कहानी है।
- संतराम शर्मा'हिन्दी'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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