अपने मन की स्नेह सरिता से
सरस श्रृंखला बुनता हूं,
कर्म, धैर्य, संयम,शील से
सृजन के सुमन चुनता हूं।
निर्माण नित्य धर्म मेरा,
पथ परिभाषा ही श्रम मेरा।
नौनिहाल सदा निर्बाध बढ़े,
बस ये ही सपने बुनता हूं।
मेरा गौरव मेरे शिष्य हैं,
भारत का उज्ज्वल भविष्य हैं।
ऊर्जा उत्कंठा का उत्थान रहे,
अहर्निष यही बस भान रहे।
सब गुल गुलशन गतिमान रहे,
अन्तर्मन में यही ध्यान रहे।
मैं शिक्षक हूं, शिक्षा को सम्बल दूं,
बस यही मेरी पहचान रहे।
--संतराम शर्मा 'हिन्दी'
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