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करवटों की रात

                
                                                         
                            करवटों में रात उलझी,
                                                                 
                            
बैचेन सांसे हो रही।
नीन्द नयनों से जुदा है,
ख्वाहिशें है सो रही।

ख्वाब कोई टूट गया है,
हकीकत भी, रो रही।
आह मन की बूंद बनकर,
खुद को खुद से धो रही।

बेहतर कल की आशा थामे,
राही कुछ विचार कर।
ठोकरों की टीस भूल,
राह से फिर प्यार कर।

वेदना पर वजन रख और,
चेतना का संचार कर।
ज़िन्दगी के गम बेचकर
चल खुशियों का विस्तार कर।

भूल कल की बात सारी
आज का प्रचार कर।
प्रत्याशा तेरी प्रेयसी है
जी भरकर उससे प्यार कर।
-संतराम शर्मा 'हिन्दी'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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