आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

प्यार और नफ़रत

                
                                                         
                            अरे यार, नफरत करने के लिए इतना समय कहाँ से लाते हो,
                                                                 
                            
मुझे तो मोहब्बत करने के लिए भी ज़िंदगी कम लगती है...
ये दिल तो बना है प्यार के लिए,
नफरत में क्यों इसे भरते हो..
दो पल की है जिंदगी, हँस के जी लो,
क्यों बेवजह दिलों में ज़हर भरते हो..
मोहब्बत से ही रोशन है ये जहाँ सारा,
नफरत से क्यों इसे अँधेरा करते हो..
आओ, प्यार बाँटें, गिले-शिकवे मिटा दें,
इसी प्यार में तो खुदा बसता है..
मिटा कर दूरियाँ, बाँहें फैला कर देखो,
हर इंसान में तुम्हें अपना ही अक्स दिखेगा।
ये नफ़रत तो बस एक पल का साया है,
मोहब्बत का दिया तो सदियों तक जलेगा।
चलो आज एक नई शुरुआत करते हैं,
दिलों के सारे शिकवे भुला देते हैं।
नफ़रत को हरा कर इस जहाँ में,
सिर्फ़ और सिर्फ़ मोहब्बत जगा देते हैं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर