नशा जब उतरता है, तो आईना डराता है,
वजूद का शोर फिर, खामोशी में बदल जाता है।
ढलती उम्र का तकाजा, समझ नहीं आता है,
जरा देख मधुशाला बुलाता है।।
ख़्वाबों के महलों में, खुद को सजाता है,
हकीकत की धरातल से, दूर ले जाता है।
जो खो गया रूह में, वो लौट कहाँ आता है,
जरा देख मधुशाला बुलाता है।।
प्यासा था जो कभी, अब दरिया में डूब जाता है,
किनारे की कश्ती को, खुद ही जलाता है।
नशा-ए-मदिरा का यह सिलसिला, किसको समझ आता है,
जरा देख मधुशाला बुलाता है।।
-सर्वेश यादव
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