समुंदर किनारे पड़े पत्थर जैसा बन गया हूँ मैं,
अकेले रहना कहाँ से सीख गया हूँ मैं।
दोस्ती की कश्ती में बैठा था मैं,
किनारा देखकर खुश हो गया था मैं।
तैरना आता था मुझे,
पर पता नहीं कैसे डूब गया मैं।
फ़रिश्तों की तलाश में था मैं,
समझना सीख गया मैं,
उड़ना सीख गया मैं,
अकेले रहना सीख गया मैं।
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