आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अकेले रहना सीख गया मैं

                
                                                         
                            समुंदर किनारे पड़े पत्थर जैसा बन गया हूँ मैं,
                                                                 
                            
अकेले रहना कहाँ से सीख गया हूँ मैं।

दोस्ती की कश्ती में बैठा था मैं,
किनारा देखकर खुश हो गया था मैं।
तैरना आता था मुझे,
पर पता नहीं कैसे डूब गया मैं।

फ़रिश्तों की तलाश में था मैं,
समझना सीख गया मैं,
उड़ना सीख गया मैं,
अकेले रहना सीख गया मैं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर