मासूम सा दिल, सादगी का वो गहना,
नहीं आता इसे छल-कपट में बहना।
सीधा-साधा जीवन, ना कोई चतुराई,
दुनियां ने सदा इसकी ही कीमत उठाई।
फायदा उठा कर जो हँसते हैं बाहर,
क्या सच में सुखी है उनका वो भीतर ?
जो छल से जीता, वो खुशियाँ कहाँ पाएगा,
अंदर का सन्नाटा उसे हर पल सताएगा।
छल की दीवारों पर महल जो सजाते हैं,
अंदर ही अंदर वो खुद से डर जाते हैं।
जो मासूम को ठग कर जीत मनाते हैं,
वो सुकून की मीठी नींद कहाँ पाते हैं?
सच्ची खुशी का रास्ता सादगी से होकर जाता है,
दूसरों को रोता देख जो हँस्से,
वो इंसान कहाँ कहलाता है?
इसलिए तू अपनी इस साफ नीयत
पर कभी मलाल न कर,
दुनियां चाहे जो सोचे, तू अपने भीतर
का उजाला कम न कर।
मासूमियत कमजोरी नहीं, एक वरदान है,
साफ दिल रखना ही इंसान की पहचान है।
बाहर की झूठी हँसी तो बस एक दिखावा है,
सच्चा सुकूं तो सिर्फ़ सच्चे दिल का बुलावा है।
-: सार्थक पियुष सिंह
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