आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मासूमियत का मोल

                
                                                         
                            मासूम सा दिल, सादगी का वो गहना,
                                                                 
                            
नहीं आता इसे छल-कपट में बहना।
सीधा-साधा जीवन, ना कोई चतुराई,
दुनियां ने सदा इसकी ही कीमत उठाई।

फायदा उठा कर जो हँसते हैं बाहर,
क्या सच में सुखी है उनका वो भीतर ?
जो छल से जीता, वो खुशियाँ कहाँ पाएगा,
अंदर का सन्नाटा उसे हर पल सताएगा।

छल की दीवारों पर महल जो सजाते हैं,
अंदर ही अंदर वो खुद से डर जाते हैं।
जो मासूम को ठग कर जीत मनाते हैं,
वो सुकून की मीठी नींद कहाँ पाते हैं?

सच्ची खुशी का रास्ता सादगी से होकर जाता है,
दूसरों को रोता देख जो हँस्से,
वो इंसान कहाँ कहलाता है?

इसलिए तू अपनी इस साफ नीयत
पर कभी मलाल न कर,
दुनियां चाहे जो सोचे, तू अपने भीतर
का उजाला कम न कर।

मासूमियत कमजोरी नहीं, एक वरदान है,
साफ दिल रखना ही इंसान की पहचान है।
बाहर की झूठी हँसी तो बस एक दिखावा है,
सच्चा सुकूं तो सिर्फ़ सच्चे दिल का बुलावा है।

-: सार्थक पियुष सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर