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सरकारी मुहर का समाज

                
                                                         
                            गाँव की उन गलियों में,
                                                                 
                            
एक अजीब सा मंजर दिखता है,
पढ़ा-लिखा बस वही कहाए,
जिसका सिक्का सरकारी बिकता है।

डिग्रियां सब धरी रह जाती हैं,
मेहनत का मोल नहीं होता,
जो पा ले सरकारी कुर्सी,
बस वही आँखों का तारा होता।

आज के लोगों की सोच न जाने,
किस दिशा में बहने लगी है,
सच्ची काबिलियत छोड़, दुनिया
बस रुतबे के पीछे भागने लगी है।

किस नजरिए से देखते हैं लोग,
इंसानियत का पैमाना भूल गए,
कागज़ के एक टुकड़े के आगे,
सब अच्छे संस्कार दूर गए।

एक सरकारी नौकरी जेंसे,
हर गुनाह का पर्दा बन जाती है,
इंसान ने की हों चाहे कितनी गलतियाँ,
सबको पल में छुपाती है।

चाहे वो इंसान अंदर से कितना भी गलत क्यों न हो,
पर दुनिया की नजरों में,
वो सबसे सही और बेदाग हो जाता है।

-: सार्थक पियुष सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
56 मिनट पहले

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