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नदी का दर्द

                
                                                         
                            न जाने कितने दर्द छुपाकर,
                                                                 
                            
नदी किनारे-किनारे बहती है,
खुद की कोई बात न कहकर,
सबकी प्यास बुझाती रहती है।

किसी ने पत्थर फेंके उस पर,
किसी ने गंदा किया आँचल,
फिर भी उसने भेद न माना,
सबको दिया अपना निर्मल जल।

अपने सीने पर नावें ढोकर,
कितनों को उस पार पहुँचाया,
कितने आँसू खुद में लेकर,
दूसरों के चेहरे पर सुख लाया।

कभी किसी ने पूछा ही नहीं,
कितना बोझ उठाती होगी,
कितनी रातें चुपचाप रोकर,
सुबह फिर मुस्काती होगी।

पेड़ कटे तो दर्द सहा उसने,
किनारे टूटे, फिर भी बहती रही,
इंसान ने जितना दर्द दिया,
उतना ही देती रही जिंदगी।

शायद इसलिए कि नदी हूँ मैं,
मेरा दर्द कोई पढ़ नहीं पाता,
मैं अगर इंसान होती शायद,
तो यूँ चुप रहकर जी न पाता।

मेरी खामोशी को कमजोरी मत समझना,
इन लहरों में भी एक कहानी है,
मैं सबका दर्द अपने भीतर रखती हूँ-
शायद इसी का नाम नदी की जिंदगानी है।

-: सार्थक पियुष सिंह
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

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