बीज से शुरू होती है जिसकी जीवन-कहानी,
मिट्टी में दबकर लिखती है अपनी जुबानी।
अंधियारे में रहकर भी उजियारा देती है,
अपने हिस्से का जीवन हम पर वार देती है।
धूप उसे जलाती है, बारिश भिगोती है,
ठंडी हवाओं में भी चुपचाप वह सोती है।
न शिकायत करती है, न कोई सवाल करती है,
बस धीरे-धीरे धरती की गोद में पलती है।
खुद तपती है, ताकि हमारे चूल्हे जलें,
खुद मिटती है, ताकि घरों में निवाले मिलें।
अपने जीवन का हर फल हम पर वार देती है,
मासूम फसल हमारी भूख का भार लेती है।
कभी सोचा है-कटते समय
उसकी खामोशी क्या कहती होगी?
जब दरांती उसकी साँसें काटती होगी,
क्या मिट्टी भी उसके दर्द पर रोती होगी?
जिसने किसी से कुछ माँगा नहीं,
बस सबकी भूख मिटाने का धर्म निभाया,
उस निश्छल जीवन को हमने
अपने स्वार्थ के आगे क्यों भुलाया ?
दूसरों की पीड़ा में जो मुस्कुराते हैं,
वे इंसान होकर भी इंसानियत कहाँ निभाते हैं?
जिस अन्न के दाने से जीवन हमारा चलता है,
उसी के बलिदान पर मनुष्य क्यों इतराता है?
ज़रा ठहरो उस खेत की ओर देखो,
जहाँ हर दाना एक कहानी कहता है।
किसी किसान का पसीना,
किसी माँ की रोटी और
किसी भूखे की उम्मीद बनकर रहता है।
फसल केवल फसल नहीं,
यह धरती का मौन उपहार है,
इसके हर एक दाने में
किसी जीवन का आधार है।
आओ, इसके दर्द को महसूस करें,
इसके त्याग का सम्मान करें।
थाली में आया एक भी दाना
व्यर्थ न जाने दें -
और फसल के इस निश्छल बलिदान को
अपने जीवन का सार्थक सम्मान दें।
-सार्थक पियुष सिंह
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