गमोगुस्से से कोई बात क्यों कहतेहो तुम मुझसे
मैं तो खामोशियाँ से ही तुम्हारी जी नही पाती
तुम्हारे ही खयालों में गुजर होती मेरे दिल की
मैं पलभर को अकेले दूर तुमसे रह नही पाती
कोई इल्जाम देने से सजा मिलती है मिल जाये
खुशी से जो भी देते हो मना मैं कर नही पाती
ये जाने कैसी बातें हैं जो मेरे साथ होती है
मुहब्बत ही है ये शायद जिसे मैं कह नही पाती
परेशां तुम जो होते हो मेरी सांसें उखड़ती हैं
तेरे माथे दिखे चिंता तो फिर मैं सो नहीं पाती
रहोगे साथ तुम मेरे अलग हो ही नही सकते
हो मेरी रूह में शामिल जुदा मैं कर नही पाती
कभी भी कोई उलझन हो मुझे सब बांध के देदो
उलझा देख तुमको मैं भी सुलझी रह नही पाती
तुम्हारे साथ है वो बंधन नही जो जीते जी टूटे
तुम्हारे बिन तसव्वुर एकपल का कर नही पाती
सरोज""सरु""
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