शाम गुजरी है तो फिर दिन भी गुजर जाएगा
तेरे न आने से क्या वक्त ठहर जाएगा
हमने तेरी राह में पलकों को बिछाए रखा
राह की गर्द अब आंखों में उतर जाएगा
वक्त मरहम तो है ये घाव को भर ही देगा
हाँ मगर दिल पर एक दाग उभर जाएगा
हमने इस तरह तुझे टूट के चाहा क्यों है
बेरुखी से तेरी ये अब तो बिखर जाएगा
मैंने एक पहरा लगा रखा था सदियों पहले
क्या पता दिल तेरे छूते ही निकल जायेगा
कितने वादे मेरे इस दिल से किये थे तुमने
कहाँ मालूम था एक दिन तूँ मुकर जाएगा
मेरी आहें मेरे दिल को ही सजा देती हैं
ऐसी हालत में भला दिल ये किधर जाएगा
तुमने बरबाद किया हमने ये कहा कब है
मेरे मिट जाने का इल्जाम इधर आएगा
मेरे लब और जिगर दोनो की दुआ तेरे लिए
दिल को मरना ही है एकदिन कभी मर जायेगा
मुझको ख्वाबों में सही कुछ दिन तो मुहब्बत देते
यही हसरत लिए दिल जाने जिगर जाएगा..........
सरोज यादव सरु
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