निकल आये है फिर से गांव की पगडंडियों पर
पुरानी अमराइयों के बीच कोयल की कूक रोमांचित करने लगी फिर से
याद दिला रही हो जैसे वो बेफिक्री का बीता जमाना
खो जाते थे जब अनगढ़ सोच लिए जाने किस दुनिया मे
बादलों के कपासी उजले रूप को बदलता रहता था कोई कारीगर
और देख देख खुश होते हम अपनी कल्पना की आकृति
बीत गया उन्ही बनते बिगड़ते आकृतियों की तरह वो बेपरवाह दिन
आज भी घटित होगा सबकुछ वैसा ही
बस फुरसत नही रही कोयल के गीत सुन बादल को देखने की
कहते हैं सयाने हो गए हम अब नही रही वो कल्पनाएं
या हमने ही दे दीं हैं विरासत में नई आंखों को अपना सुनहरा कल
और खुद ले लिया अपनी यादों की कीमती पोटली
जब तब देखके खुश होने को अपना अनमोल खजाना
तभी तो वक्त निकाल कर चले आये है
फिर से हम
गांव की पगडंडियों पर पुरानी अमराइयों के बीच
सरोज यादव सरु
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