आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

निकल आये हैं फिर से गांव की पगडंडियों पर

Nikal Aaye Hain Fir Se Ganv Ki Pagdandiyon Par
                
                                                         
                            निकल आये है फिर से गांव की पगडंडियों पर
                                                                 
                            
पुरानी अमराइयों के बीच कोयल की कूक रोमांचित करने लगी फिर से
याद दिला रही हो जैसे वो बेफिक्री का बीता जमाना
खो जाते थे जब अनगढ़ सोच लिए जाने किस दुनिया मे
बादलों के कपासी उजले रूप को बदलता रहता था कोई कारीगर
और देख देख खुश होते हम अपनी कल्पना की आकृति
बीत गया उन्ही बनते बिगड़ते आकृतियों की तरह वो बेपरवाह दिन
आज भी घटित होगा सबकुछ वैसा ही
बस फुरसत नही रही कोयल के गीत सुन बादल को देखने की
कहते हैं सयाने हो गए हम अब नही रही वो कल्पनाएं
या हमने ही दे दीं हैं विरासत में नई आंखों को अपना सुनहरा कल
और खुद ले लिया अपनी यादों की कीमती पोटली
जब तब देखके खुश होने को अपना अनमोल खजाना
तभी तो वक्त निकाल कर चले आये है
फिर से हम
गांव की पगडंडियों पर पुरानी अमराइयों के बीच

सरोज यादव सरु

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर