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मैंने रखा फूलों पर फिर मन का पंछी घायल क्यों

                
                                                         
                            मैंने रखा फूलों पर फिर मन का पंछी घायल क्यों
                                                                 
                            
जल जल उड़ता बिन पिघले ही मन कपूर का कायल क्यों
जाने क्यों पलकें सूनी हैं जाने क्यों मन भीगा है
जाने कब यह जुड़ गया तुमसे ये कुसूर तो इसका है
मेरी खुशियां रास न आयें मन हरदम ही घायल क्यों
जल जल उड़ता बिन पिघले ही मन कपूर का कायल क्यों
ऐसे तो क्या रह जायेगा मन का आँगन यूँ भी सूना
जब भी तेरी राहें देखूँ कर देता है वह दुख दूना
तुमको तो परवाह नही है रोती है फिर पायल क्यों
जल जल उड़ता बिन पिघले ही मन कपूर का कायल क्यों.
मैंने रखा फूलों पर फिर मन का पंछी घायल क्यों
जल जल उड़ता बिन पिघले ही मन कपूर का कायल क्यों........

सरोज यादव सरु

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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