चित्रकोट का प्रपात देख लो, इंद्रधनुष-सा रंग बिखेरे,
गिरती जलधारा के मोती, स्वर्गिक सुख के द्वार सवेरे।
इंद्रावती की कल-कल धुन में, प्रकृति राग सुनाती है,
हर गिरती जल-बूँद धरा पर, जीवन-ज्योति जगाती है।
दूर-दूर से पथिक चले आते, सौंदर्य यहाँ निहारने,
धरती माँ के अनुपम गहने, हृदय-हृदय में उतारने।
जो भी आया चित्रकोट में, स्मृतियाँ साथ ले जाएगा,
जीवन भर उस अनुपम दृश्य का, मधुर गीत ही गाएगा।
तीरथगढ़ की शीतल धारा, मन के सारे ताप बुझाए।
वन्य जीव और पंछी मिलकर, जीवन-राग सुनाते हैं,
प्रकृति के हर कोमल स्पर्श से, मन मंदिर महकाते हैं।
गुफाओं का अद्भुत संसार, युगों का इतिहास कहे,
धरती के अंतर की महिमा, मौन स्वयं उद्घाटित रहे।
प्रकृति का यह पावन आँगन, भारत का अभिमान बने,
हर पर्यटक के अंतर्मन में, बस्तर की पहचान बने।
दंतेवाड़ा धाम सुहाना, माँ दंतेश्वरी का द्वार,
श्रद्धा लेकर जो भी पहुँचे, भर जाए उसका संसार।
घंटों की पावन झंकारों में, भक्ति-भाव उमड़ आता,
माँ के चरणों में झुकते ही, मन निर्मल हो जाता।
आस्था की यह अमिट ज्योति, युग-युग तक जलती जाए,
बस्तर की पावन संस्कृति को, विश्व-गगन तक पहुँचाए।
माँ के चरणों की यह रज, जीवन का वरदान बने,
हर श्रद्धालु के अंतस में, विश्वास महान बने।
अबूझमाड़ की पावन धरती, रहस्यों की पहचान यहाँ,
प्रकृति के संग जीवन जीना, सबसे बड़ा विधान यहाँ।
सरल हृदय, निष्कपट मुस्कानें, मानवता का मान यहाँ,
मेहनत, सेवा, प्रेम, समर्पण, जीवन का अभियान यहाँ।
वन-संपदा की हर डाली, श्रम का गीत सुनाती है,
धरती माता की ममता का, संदेश नया लाती है।
जनजातीय जीवन से सीखो, प्रकृति का सम्मान करो,
धरती माँ की हर नेमत का, मिलकर सब गुणगान करो।
अब विकास की स्वर्णिम गाथा, घर-घर नई कहानी है,
शिक्षा, सेवा, श्रम और विज्ञान, बस्तर की नई निशानी है।
संस्कृति, प्रकृति और प्रगति का, अनुपम संगम देखो तुम,
भारत के उज्ज्वल भविष्य का, स्वर्णिम अभिनंदन देखो तुम।
जो पढ़ ले बस्तर की महिमा, मन उसका पुलकित हो जाए,
बार-बार यह गीत सुनाकर, भारत का गौरव गाए।
पाठक मन से स्वयं पुकारे—
"वाह! क्या अनुपम चित्र उकेरा, वाह! क्या अद्भुत रचना है!
बस्तर भारत का गौरव है, सचमुच धन्य ये धरती है!"
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