उबाल मारतीं नदियाँ-नाले, चलीं सागर से मिलने आज,
घूँघट खोले सागरिका बोली—"आओ प्रिय! कैसा यह राज?"
लहरों ने बाहें फैलाकर, सबका स्वागत खूब किया,
पर कुछ धाराएँ प्रेम नहीं, अपने संग विष भी ले आईं।
काजल बनकर मेघ सजे थे, बिजली पहने नील चुनर,
प्रेम-भेंट की बेला में ही, किसने फूँका वैर का स्वर?
जो धारा मर्यादा भूले, तट भी फिर चुप कब रहता,
शांत दिखाई देता सागर, भीतर ज्वालामुखी बहता।
मिलन अगर निर्मल मन से हो, गंगा भी अमृत बन जाती,
छल-कपट लेकर जो पहुँचे, लहरें राह बदल जातीं।
सागरिका मुस्काकर बोली—"प्रेम मेरा कमज़ोरी नहीं,
जो मर्यादा का मान रखे, उसके लिए दूरी नहीं।"
जो उन्मादों का हार पहनकर, मिलने का अभिनय करते हैं,
वे सीप नहीं, बस झाग बनाकर, तट पर आकर बिखरते हैं।
संदेश
प्रेम वहीं, जहाँ पावन धारा;
मर्यादा ही सच्चा श्रृंगार।
छल की नावें डूब ही जातीं,
सागर रखता सबका हिसाब।
- सुरेश पटेल "सुरेश"
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