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जल-प्रलय की विभीषिका

                
                                                         
                            छाए बदरा काली-काली, बरसे मूसरधार।
                                                                 
                            
रोक सके ना तरिया-नदियाँ, न कोई सरकार।
प्रकृति जब रौद्र रूप धरती, करती भीषण प्रहार,
राजा-रंक सभी झुक जाते, होकर बड़े लाचार॥

उफन-उफन हर नदी पुकारे, सुन ले रे संसार।
मत छेड़ो तुम प्रकृति माँ को, होगा अत्याचार।
वन-पर्वत का सीना चीरा, लोभ किया अपार,
एक दिवस सब बह जाएगा, मचेगा हाहाकार॥

डूबे खेत-खलिहान सारे, डूबे घर-परिवार।
रोते बच्चे, वृद्ध और जननी, टूटा सब आधार।
जीवन भर की पूँजी बहकर, उजड़ा सारा संसार,
अश्रुधार से पूछ रही है, किसको करें पुकार॥

गाँव-नगर सब जलमग्न हुए, थमती नहीं धार।
नाव बनी अब एक सहारा, जीवन बनी पतवार।
संकट में जो हाथ बढ़ाए, वही सच्चा यार,
मानवता के आगे फीका, हर वैभव-श्रृंगार॥

सेवा लेकर हाथ बढ़े जब, पहुँचे घर-द्वार।
भूखे तन को अन्न मिला तो, खिल उठे परिवार।
दुख की घड़ी बता ही देती, अपना कौन यार,
नेकी का धन साथ रहेगा, बाकी सब बेकार॥

घोर घटाएँ लाख घिरें तो, मत होना लाचार।
धीरज रखकर बढ़ते रहना, होगा बेड़ा पार।
हर तूफ़ाँ के बाद सदा ही, खिलता नव उजियार,
सत्य, साहस, श्रम और सेवा, जीवन का आधार॥

धरती माता मौन खड़ी है, सुन लो रे सरकार।
पेड़ों का उपकार भुलाकर, काटे बारंबार।
जल, जंगल और भूमि बचाओ, यही समय की पुकार,
प्रकृति रूठी तो मिट जाएगा, मानव का संसार॥

छप्पर टपके, चूल्हा बुझा है, सूना हर घर-द्वार।
ममता फिर भी दीप जलाए, बनकर दृढ़ आधार।
माँ की आँखों में विश्वास है, बच्चों का संसार,
ममता से बढ़कर नहीं जग में, कोई भी हथियार॥

सैनिक, सेवक, नाविक दौड़े, लेकर नव संचार।
अपने प्राणों की परवाह बिन, करते जन-उद्धार।
सेवा से बढ़कर नहीं जग में, कोई और उपहार,
ऐसे वीरों को शत-शत नमन, भारत का श्रृंगार॥

सुख-दुख दोनों साथ चलें तो, जीवन हो साकार।
गिरकर जो फिर उठना जाने, वही बने दमदार।
विपदा केवल राह दिखाती, देती नया विचार,
संघर्षों की अग्नि तपाकर, कुंदन करे किरदार॥

आओ मिलकर प्रण यह लें हम, होगा शुभ व्यवहार।
नदियाँ स्वच्छ रहें सदियों तक, हरियाली अपार।
धरती माँ की गोद महकती, गूँजे जय-जयकार,
आने वाली हर पीढ़ी का, हम पर है अधिकार॥

छाए बदरा काली-काली, बरसे मूसलधार।
प्रकृति देती है चेतावनी, सुन लो बारंबार।
प्रेम, दया, सद्भाव जगाओ, यही अमर हथियार,
प्रकृति संग जो जीना सीखे, उसका हो उद्धार॥
— सुरेश पटेल "सुरेश"


 
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3 महीने पहले

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