मौन धारि निर्मल हृदय, सुमिरो गुरु का नाम।
हे ईश्वर! पूरी करो, विनय सुबह और शाम ॥ १ ॥
अहित किसी का भी करूँ, उठें न मेरे हाथ।
बुद्धि-कदम रुक जाएँ तब, देना ऐसा साथ ॥ २ ॥
कुमति मिटे सुमति जगे, मन में रहे विवेक।
पाप कर्म से मैं बचूँ, रस्ता चुनूँ अनेक ॥ ३ ॥
सोच, कर्म या शब्द हो, ओझल नहीं हुजूर।
दिव्य दृष्टि तेरी सदा, देख रही है नूर ॥ ४ ॥
छिपे न तुझसे भाव कोई, तू ही पालनहार।
देख रहा तू कर्म सब, जग के सिर्जनहार ॥ ५ ॥
सब कुछ जाने सर्वज्ञ तू, घट-घट का आधार।
धर्म, करुणा, सत्-मार्ग पर, जीवन हो साकार ॥ ६ ॥
दया भाव मन में रहे, करुणा की हो धार।
सत्य मार्ग छूटे नहीं, चाहे छूटे संसार ॥ ७ ॥
मन पावन निर्मल रहे, पहुँचे कष्ट न कोय।
विनम्र प्रार्थना यह मेरी, शुद्ध अंतःकरण होय ॥ ८ ॥
वाणी में कड़वाहट न हो, दुख न पाए कोय।
मेरे कारण इस जगत में, कोई कभी न रोय ॥ ९ ॥
सच्चे मन से जो भजे, गुरुदेव की आन।
जयकारा लगाओ प्रेम से, होगा कल्यान ॥ १० ॥
इष्टदेव पर रख भरोसा, मन का संशय त्याग।
श्रद्धा से सुमिरन करो, जाग उठेगा भाग्य ॥ ११ ॥
जय गुरुदेव पुकार के, शीश झुकाओ आज।
कृपा करेगी दिव्य शक्ति, सिद्ध करेगी काज ॥ १२ ॥
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