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तुम खुद को चुनना

                
                                                         
                            दीपक बनकर जलना ही
                                                                 
                            
हर आँगन का धर्म नहीं।
जो खुद ही अँधियारा पी जाए,
उसका कोई मर्म नहीं।

हर पीड़ा पर हाथ बढ़ाओ,
ऐसा भी उपकार न हो;
अपनी धड़कन ही भूल जाओ,
ऐसा भी लाचार न हो।

स्नेह लुटाना सुंदर है,
पर खुद को खो देना क्यों?
हर चेहरे की ख़ातिर अपने
मन को यूँ दुख देना क्यों?

जो ठहरे, उनका स्वागत हो;
जो जाएँ, उनको जाने दो।
अपना आकाश समेटो तुम,
शेष दिशाएँ बहने दो।

अब अपने हिस्से की खुशियाँ
अपने ही भीतर बोना तुम।
दुनिया जितनी साथ चले,
दुनिया का उतना होना तुम।

सबसे पहले स्वयं को चुनना,
यह कोई अपराध नहीं;
जो खुद का सम्मान न जाने,
उसका कोई साथ नहीं।

जब तुम अपने हो जाओगे,
जग भी तुमको पहचानेगा;
जो आज सहज ही खो बैठा,
कल वही पछताएगा।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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