आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

रंगमंच की कठपुतलियां

                
                                                         
                             रंगमंच की कठपुतलियां 
                                                                 
                            

आंखों में काजल
होठों पे लिपस्टिक
हाथ भरकर चूड़ियां थी
दुनिया का मेला था और
तीन जवान लड़कियां थी |

मैं भी वही था , मगर अकेला
मेरे लिए तीनों हसीन थी
ना कम , ना ज्यादा...मगर
पहली लड़की ने मुझे ठुकरा दिया, क्योकि
मेरी जाति उससे छोटी थी
दूसरी लड़की ने मना किया , क्योकि
हमारा धरम जुदा था
लेकिन तीसरी लड़की जो
मेरी ही जाति और धरम की थी
उसने भी मुझे मना कर दिया क्योंकि
उसे गोरा लड़का चाहिए था |

एक लड़की और थी
जो सबसे ज्यादा खूबसूरत थी मगर
उसकी जाति मेरे से छोटी थी
दलित थी , अछूत थी और
वो मुझसे शादी के लिए राजी हो गयी |

मैं खुशी के मारे झूम रहा था
हसीन ख्वाब बुन रहा था , और
उन सबकी नजरों को निहार रहा था
जो भोर तक रंगमंच पर टिकी रही......
किसी को सुई , किसी को धागा तो
किसी को गुड़िया पसंद थी
ताज्जुब की बात है....
एक लड़की को छोड़कर
तीनों को कठपुतलियां पसंद थी |
" संतोष यदुवंशी "


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर