पंडित जी कहकर
लोग उन्हें ,
पूरे सूबे में बुलाते थे
नाम भले ही भूल जाए मगर
दूबे जरूर लगाते थे
नई उमर थी अभी , नया जोश था
शुद्ध देशी भाषा में हमें वो
इकोलॉजी पढ़ाते थे |
जब वह पढ़ाते तो
नई-नई तरकीब अपनाते
इकोसिस्टम को मानों
समाज से जोड़कर समझाते
कहते की.....
जिसकी संख्या जितनी ज्यादा होगी
वह उतना नीचे रहेगा
शेर की संख्या कम है
इसीलिए वह सबसे ऊपर रहेगा
कभी भौहें सिकोड़ते तो
कभी माथा थपथपाते
मायावती मुख्यमंत्री क्यों है ?
इसके सौ - सौ दोष गिनाते
पढ़ने वाले बच्चे कहते की
सर बहुत अच्छा पढ़ाते है
पता नहीं क्यों ? मुझे लगता था
सर लोकतंत्र का मजाक उड़ाते हैं |
शेर का मतलब राजा नहीं होता है
ऐसा इकोलॉजिस्ट का मत है
वे कहते हैं कि....
शेर की जरूरत सिर्फ इसलिए है
क्योंकि अगर शेर ना हो तो
घास खाने वाले लोग पूरी घास खा जाएंगे
घास हमारे लिए खाना बनाती हैं
जब घास नहीं तो कुछ नहीं
ये दुनिया भी नहीं....
शेर कभी घास नहीं खा सकता |
अंग्रेजी के मशहूर पोएट
विलियम वर्ड्सवर्थ की
‘लूसी ग्रे ' भी एक घास थी , और
हिंदी के अज्ञेय लोगो को जिस ढाल पर बैठने के लिए बुलाते थे
उस पर भी हरी घास बिछी हुई थी |
मेरे क्लास की लड़कियां
हमेशा आगे की बेंच पर बैठती थी
शुक्ला , तिवारी और अवस्थी जी
पढ़ने में सबसे अच्छी थी
आपस में बातें करती
और कहती....
सर कितने अच्छे हैं
देखो ना कितने क्यूट है
मुझे हमेशा लगता की
ये लड़कियां झूठ बोल रही है
यहां ना कोई इनोसेंट है और
ना ही कोई क्यूट है
समस्या बड़ी है क्योकि
पूरी क्लास कंफ्यूज है |
सिर्फ मुझे छोड़कर....क्योकि
मैं पढ़ने में गधा था और
सबसे पीछे बैठता था
दीवार के कोने में बैठकर
क्लास की सबसे खूबसूरत लड़की के
हुस्न में डूबती कविताएं लिखता था
रोज नई- नई कविताएं लिखी जाती
मगर लड़की वही होती |
मुझे किसी परीक्षा में पास होने के लिए
पढ़ने की जरूरत महसूस नहीं होती क्योकि
मुझे पता है की ‘पाश’ का पूरा नाम
‘अवतार सिंह ’ है , बावजूद
उन्होंने शेर के ऊपर कोई कविता नहीं लिखी
वे हमेशा कहते थे कि
“ मैं घास हूं " | |
~ संतोष यदुवंशी
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