स्वाभिमान की बेड़ियां है
बोलो ! मेरे लिए खुली थी कब ?
इस छद्म भरे नाटक से हमको
पहले ही कर देते अलग
मेरे वजूद की मैयत पर
जो तुम दरबार सजाओगे
किसी का साथ निभाने के लिए
एक दिन तुम भी पछताओगे | |
~ संतोष यदुवंशी
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