वो दौर कुछ और था, ये दौर कुछ और है,
तब इंसानियत थी, आज हैवानियत का शोर है।
पहले झोंपड़ियों में भी सुकून मिला करता था,
आज महलों में भी दिल बेचैन हुआ करता है।
रिश्तों में मिठास थी, अपनों पर ऐतबार था,
थोड़े में भी खुशियाँ थीं, प्रेम का संसार था।
आज बस एक अंधी दौड़ है,
हर शख्स उसी के पीछे भाग रहा है,
ठोकरें खाकर भी न संभलता है,
न जाने किस मंज़िल की चाह में जाग रहा है।
इंसानियत पर धूल की इतनी परतें चढ़ गईं,
कि संवेदनाओं की राहें भी कहीं खो गईं।
अब कोई आईना दिखाने वाला नहीं,
गिरते हुए को हाथ बढ़ाने वाला नहीं।
धन-दौलत के इस अंधे सफ़र में,
इंसान अपना ही वजूद खो रहा है,
जिस सुकून को दुनिया में ढूँढ़ता फिरता है,
उसी सुकून से दूर होता जा रहा है।
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