जब जुर्म हद से ज़्यादा बढ़ जाए,
समझो देश में दुश्मन घुस आए।
जब सच की आवाज़ दबने लगे,
और झूठ ही हर ओर मुस्काए।
जब ईमान बिकने लगे सरेआम,
और बेईमान सम्मान पाए।
जब रिश्वत बन जाए दस्तूर,
और न्याय भी सिर झुकाए।
जब अपनों से ही ख़तरा बढ़े,
और अपना ही घर जल जाए।
जब युवा भटकने लगें राहों से,
और संस्कार पीछे छूट जाएँ।
जब मातृभूमि की शान पर आँच आए,
तब हर भारतवासी जाग जाए।
आओ मिलकर ऐसी लौ जलाएँ,
जिससे हर अँधियारा मिट जाए।
जुर्म मिटे, अन्याय रुके,
और भारत फिर से मुस्काए।
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