देख दुनिया के छल-कपट, मैं हैरान हूँ,
क्या होगा इनकी हसरतों का,
मैं इससे भी अनजान हूँ।
हर साँस के पीछे जैसे,
दौड़ रही कर्मों की कहानी है,
किसे खबर है कल की,
किसकी कितनी ज़िंदगानी है।
नाव लिए नासमझी की पतवार,
ये चले जा रहे हैं मझधार,
क्या पता इन्हें इस सफ़र में,
डूबेगी नाव किनारे के पास।
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