आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दुनिया के छल-कपट

                
                                                         
                            देख दुनिया के छल-कपट, मैं हैरान हूँ,
                                                                 
                            
क्या होगा इनकी हसरतों का,
मैं इससे भी अनजान हूँ।
हर साँस के पीछे जैसे,
दौड़ रही कर्मों की कहानी है,
किसे खबर है कल की,
किसकी कितनी ज़िंदगानी है।
नाव लिए नासमझी की पतवार,
ये चले जा रहे हैं मझधार,
क्या पता इन्हें इस सफ़र में,
डूबेगी नाव किनारे के पास।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
55 minutes ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर