आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

एक दिन

                
                                                         
                            "एक दिन ऐसा लाऊँगा ,
                                                                 
                            
जो चाहा था वो सब पाउँगा ।

जो लोग आज मेरी तरफ़ देखते नहीं,
वो कल मुझे देखना किस्मत समझेंगे।

जो लोग मुझे आज जानते नहीं,
वो कल मुझे जानना चाहेंगे।

लेकिन क्या मैं ये सब कर पाऊंगा?
सब से बड़ा बन पाऊंगा?

माना ये संभव नहीं ,
लेकिन असंभव भी नहीं ।

मैने कुछ सोचकर ये ठाना होगा,
अपनी गलतियों को माना होगा ।

हर बार असफल रहा हु ,
एक आखिरी बार कोशिश करना चाहता हु।

लेकिन अगर मैं इस बार हार गया,
तो फिर शायद कभी जीत न पाऊ।

हालांकि बाद में भी जीता जा सकता है ,
लेकिन "समय निकल जाने के बाद मिलने वाली खुशी,
अक्सर अधूरी ही महसूस होती है।"

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर