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हुस्न का हिसाब

                
                                                         
                            हुस्न का हिसाब
                                                                 
                            
पैमाने हुस्न के अपने, चाँद से तौलते हो,
चाँद पर दाग़ हैं जनाब, तुम किस बात पर इतराते हो?

अपने हुस्न की क़ीमत मर्दों की नज़रों से लगाते हो,
फिर उन्हीं नज़रों को झूठा कहकर ख़ुद को पाक बताते हो।

तुम्हारे हुस्न का मोल भी क्या, सिफ़र से आगे जाता है?
मर्द तारीफ़ करना छोड़ दे, तो गुरूऱ कहाँ टिक पाता है?

जिस चेहरे पर इतना नाज़, जिस रंगत पर इतना गुमान है,
उसकी हर अदा के पीछे किसी की तारीफ़ का एहसान है।

हम मर्द हैं, दिन में कई दफ़ा चेहरा धोकर निकल जाते हैं,
नूर उतरने के डर से न आईनों से, न पानी से घबराते हैं।

तुम्हें डर है कि पानी कहीं असलियत न दिखा दे,
जो तारीफ़ों ने बनाया है, कहीं एक धुलाई मिटा न दे।

हमारा चेहरा धुलकर भी हमारी पहचान रहता है,
तुम्हारा हुस्न तारीफ़ों के सहारे ही जवान रहता है।

तुम जिसे अपनी फ़ितरत, अपनी फ़तह समझ बैठे हो,
कहीं वो दूसरों की पसंद का उधार लिया हुआ गुरूऱ तो नहीं?

ज़रा पानी से पूछना, ये रंगत किसकी अमानत है,
और आईने से पूछना, इस चेहरे में तुम्हारी कितनी हक़ीक़त है।

हम मुँह धोकर भी ख़ुद से नज़र मिला लेते हैं,
तुम्हें डर है—कहीं चेहरा धुले, तो चाहने वाले भी न बदल जाएँ।
-संजीव शर्मा ज़ख़्मी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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