भोग रहे सब कर्मफल, क्यों विचलित हो मित्र,
संयम रखकर देख तू, निखरे जीवन-चित्र।
कर्मों की इस राह में, रख विश्वास अपार,
जैसा बोएगा मनुज, वैसा ही फलदार।
अंतरा १
दोष रखे सिर दूसरे, भटक रहा संसार,
अपने भीतर झाँक ले, कर मन का उपचार।
ताप बिना कब भाप रे, बिन भाप कब बयार,
दुःख की धूप जो सहे, सुख उसका संसार।
मुखड़ा
भोग रहे सब कर्मफल, क्यों विचलित हो मित्र,
संयम रखकर देख तू, निखरे जीवन-चित्र।
अंतरा २
कर्म बिना परिणाम क्या, सोच ज़रा इक बार,
श्रम के ही हर बूँद से, खिलता है संसार।
अंधियारा चाहे घना, मत होना लाचार,
चलता चल तू कर्म-पथ, होगा भोर अपार।
अंतरा ३
बीज स्वयं कहता चले, कैसा होगा वृक्ष,
जैसी होगी साधना, वैसा जीवन-लक्ष्य।
काँटे बोकर फूल की, उचित नहीं दरकार,
कहे निराला, बीज ही, वृक्ष बने फलदार।
समापन
कर्म अर्चना मान ले, कर्म सदा आधार,
संयम को साथी बना, कर जीवन साकार।
फल की चिंता छोड़कर, कर अपना उद्धार,
कहे निराला—कर्म से, सँवरे यह संसार।
-संजय निराला
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