आज समझे हैं पढ़कर किताब
छिपी है पन्नों में अक्सर किताब
हुनर था कोई या थी लाचारी
सुनाई उसने चुप रहकर किताब
ये उदासी, थकन ये खामोशी
लिख जाती हैं चहरे पर किताब
शायद हो जाते हम कामयाब
देखते जो पलट कर किताब
वक़्त ने कराये अहसास इतने
दर्द निकला है बनकर किताब
ज़िन्दगी बना ली रोशनाई
कलम ने लिखी उम्रभर किताब
-संजय कुमार
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