है अभिसिप्त व्यथा जो मेरे मन मे,
हे हरि मैं किसको बतलाऊँ।
पूरी हो यदि चाह मेरी तो,
क्यों विन्ध्य प्यारी को ललचाऊँ॥
है चाह मुझे जिसकी चाहत का,
क्यों बार-बार चहचाऊँ।
बढ़ती उसकी कटु-क्रंदन,
मैं जाते-जाते किससे कह जाऊँ॥
हे मातृभूमि इस धरा जगत की,
इस समाज को क्या सिखलाऊँ।
जो युग्मों को अलग करें,
उससे यह नीरस क्या गवाऊँ॥
नयन सी कुँवारी का क्या दोष,
यह कटु पत्थर किससे पिसवाऊँ।
है पलकों के पावस से सिंचित,
इस धरा कुंज पर किसको बैठाऊँ॥
अपने उर के नुकीले काँटों पर,
मैं किसको टहलाऊँ।
है शीतलता यदि इस जल में,
तो क्यों सांजल सा जल जाऊँ॥
न पूरी हो चाह मेरी,
हे हरि मैं जीते जी मर जाऊँ।
यह दुनिया मानती अपने मान की,
कैसे मैं सबको मनाऊँ॥
सबको एक साथ ले चलूँ,
ऐसे बेड़े कहाँ से लाऊँ।
यदि मर्यादाओं के झरनों में बहकर,
मैं अपना वंश उगाऊँ॥
निश्चय ही फलती शाखाओं के,
अंकुर को कटवाऊँ।
अगर मैं बैठकर हाथ मलूँ तो,
जीवन भर खुद को पछताऊँ॥
अपने घर की रोटी को,
आज मैं किससे बेलवाऊँ।
अगर मैं रणभूमि में आज,
कहीं कर्ण बन जाऊँ॥
तो निज जननी के हाथों से,
फिर मैं हन्ता जाऊँ।
अपने मन के प्रश्नों को मैं,
शून्य क्षितिज से लौटाऊँ॥
साथ हमारा निश्चित हो तो,
हारिल बन मैं उड़ जाऊँ।
समुचित प्रमोद की धार बन मैं,
स्नेहिल तरंगों में लहराऊँ॥
हो पूरी यदि चाह मेरी तो,
हे हरि क्यों भाग्य जगाऊँ।
जब जीवन ही मर्मज्ञों का है,
तो फिर क्या इठलाऊँ॥
है अभिसिप्त व्यथा जो मेरे मन मे,
हे हरि मैं किससे बतलाऊँ॥
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