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यदि मैं कोई पक्षी होता

                
                                                         
                            यदि मैं कोई पक्षी होता,
                                                                 
                            
उड़ता जाता गगन के पार।
कुछ भी ना दुर्लभ होता,
नभ में उड़ता पंख पसार।।

जहाँ भी जाने को जी करता,
तुरंत वहाँ उड़ जाता ।
दिखे प्रकृति की छटा निराली,
उसी दिशा मुड़ जाता।।

उड़ता हवा से बातें करता,
पर करते फर-फर ।
वह लोक भी हो आता,
जहाँ जाते सब मर कर ।।

नदी, बाग, वन सबके ऊपर,
उड़ता मैं धीरे-धीरे ।
कभी हिमालय की चोटी पर,
कभी होता सरवर तेरे ।।

सैर-सपाटे में दिन कटते,
करता जग की सैर।
तब पैदल न चलना पड़ता,
कभी न थकते पैर ।।

पर ईश्वर ने नहीं बनाया,
मुझ अबोध को खग ।
चलते-चलते थक जाते हैं,
कोमल-नाजुक पग ।।
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44 मिनट पहले

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