यदि मैं कोई पक्षी होता,
उड़ता जाता गगन के पार।
कुछ भी ना दुर्लभ होता,
नभ में उड़ता पंख पसार।।
जहाँ भी जाने को जी करता,
तुरंत वहाँ उड़ जाता ।
दिखे प्रकृति की छटा निराली,
उसी दिशा मुड़ जाता।।
उड़ता हवा से बातें करता,
पर करते फर-फर ।
वह लोक भी हो आता,
जहाँ जाते सब मर कर ।।
नदी, बाग, वन सबके ऊपर,
उड़ता मैं धीरे-धीरे ।
कभी हिमालय की चोटी पर,
कभी होता सरवर तेरे ।।
सैर-सपाटे में दिन कटते,
करता जग की सैर।
तब पैदल न चलना पड़ता,
कभी न थकते पैर ।।
पर ईश्वर ने नहीं बनाया,
मुझ अबोध को खग ।
चलते-चलते थक जाते हैं,
कोमल-नाजुक पग ।।
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