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जो जितना निर्दय पाखंडी

                
                                                         
                            दुर्बल ही तो मारे जाते,
                                                                 
                            
जब भी कोई विपदा आती।
निर्बल की लाशों पर हँसना,
नियति को भी है भाती ।।

पाप बहुत करते हैं वे,
जन्म लेते जो निर्धन घर ।
आते निर्धन, जीते निर्धन
निर्धन ही वे जाते मर ।।

जो जितना निर्दय पाखंडी,
क्यों उसी की होती पूजा ? स्वार्थ ही जिनका धर्म है,
और धर्म ना उनका दूजा ।।

मानव को है तौला जाता,
यहाँ पर केवल धन से ।
कौन दीन की सेवा करता,
यहाँ पर निश्छल मन से ?

सब समेट निज गृह के अंदर,
रहते हैं सदा जो मद में ।
निर्बल को वे सीख हैं देते,
रहा करो तुम हद में ।।

स्वार्थ रहित सच्चा है जो,
जो सबके मन को बहलाता।
सच मानो यहाँ वही साथियों!
निर्दयता से कुचला जाता।।

परेशान क्यों रहता सत्य,
सदा-सदा से इस जग में ।
क्यों कंटक है बिछे हुए,
पग-पग पर उसके मग में।।

छली पाखंडी जग में हैं जो,
करते कुत्सित कर्म घनेरे ।
थाल सजाकर जाते वे ही,
मंदिर सांझ-सवेरे ।।

ये अबोध अभिशाप भोगते,
कैसा खुदा कहो ना !
कुछ तो बोलो, पत्थर जैसे–
अब तुम मौन रहो ना ।।
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55 मिनट पहले

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