आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पंडित भोंदू राम

                
                                                         
                            एक थे पंडित भोंदू राम,
                                                                 
                            
कथा ही कहना उनका काम ।
पोथी-पतरा संग ही रहता,
नाक सदा रहता था बहता ।।

जहाँ भी जाते कथा वे कहते,
लगता नाक से अमृत बहाने ।
रहते थे वह धोती पहने,
चोटी के तो क्या ही कहने ।।

लम्बी चोटी- मोटी गाँठ,
लगन में दिखती उनकी ठाट।
अगड़म-बगड़म कथा वे कहते,
वो ही समझते जो वह कहते।।

केवल वे दक्षिणा चढ़वाते,
पत्थर को ठाकुर बतलाते ।
सारा प्रसाद वे खुद ही खाते,
है ठाकुर जी का भोग, बताते ।।

लोग बहुत ही मूरख होते,
ऐसे पंडित के ढोंग जो ढोते।
चिउरा-दही पर टूटे ऐसे,
भूखे हों बरसों के जैसे ।।

श्राद्ध कर्म में भी फ़रमाते,
मूर्ख जनों को वह भरमाते ।
विविध भांति के दान-दक्षिणा,
लूट-लूट कर वह खाते ।।

कहते बाछी इसे छुवाओ,
पार बैतरणी कराओ ।
हमको भोजन स्वादिष्ट कराओ,
तीनो लोक में सुख तुम पाओ।।

बैतरणी जब स्वर्ग में है,
कोई कैसे यहाँ से पार करे।
बछिया कैसे स्वर्ग में जाती,
कैसे बैतरणी पार कराती ?

वाह पंडित जी ! कितने ज्ञानी?
मुर्दे संग भी की बेईमानी ।
बछिया पंडित के घर जाती,
फिर बैतरणी कैसे पार कराती ?

बेंच-बांच कर पंडित बाछी,
हैं अपनी पूंजी बनाते ।
केवल अपने निज स्वार्थवश,
लोगों को है मूर्ख बनाते ।।

भोंदू राम भी यही थे करते,
जब भी कोई जन थे मरते।
श्राद्ध-कर्म करवाने जाते,
झूठ-मूठ दक्षिणा चढ़वाते।।

बाछी बेचने जब गए बाजार,
खुला भेद फिर खाए मार ।
बोले हम केवल जन को भरमाते,
इसी से हैं हम जीते-खाते।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
55 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर