एक थे पंडित भोंदू राम,
कथा ही कहना उनका काम ।
पोथी-पतरा संग ही रहता,
नाक सदा रहता था बहता ।।
जहाँ भी जाते कथा वे कहते,
लगता नाक से अमृत बहाने ।
रहते थे वह धोती पहने,
चोटी के तो क्या ही कहने ।।
लम्बी चोटी- मोटी गाँठ,
लगन में दिखती उनकी ठाट।
अगड़म-बगड़म कथा वे कहते,
वो ही समझते जो वह कहते।।
केवल वे दक्षिणा चढ़वाते,
पत्थर को ठाकुर बतलाते ।
सारा प्रसाद वे खुद ही खाते,
है ठाकुर जी का भोग, बताते ।।
लोग बहुत ही मूरख होते,
ऐसे पंडित के ढोंग जो ढोते।
चिउरा-दही पर टूटे ऐसे,
भूखे हों बरसों के जैसे ।।
श्राद्ध कर्म में भी फ़रमाते,
मूर्ख जनों को वह भरमाते ।
विविध भांति के दान-दक्षिणा,
लूट-लूट कर वह खाते ।।
कहते बाछी इसे छुवाओ,
पार बैतरणी कराओ ।
हमको भोजन स्वादिष्ट कराओ,
तीनो लोक में सुख तुम पाओ।।
बैतरणी जब स्वर्ग में है,
कोई कैसे यहाँ से पार करे।
बछिया कैसे स्वर्ग में जाती,
कैसे बैतरणी पार कराती ?
वाह पंडित जी ! कितने ज्ञानी?
मुर्दे संग भी की बेईमानी ।
बछिया पंडित के घर जाती,
फिर बैतरणी कैसे पार कराती ?
बेंच-बांच कर पंडित बाछी,
हैं अपनी पूंजी बनाते ।
केवल अपने निज स्वार्थवश,
लोगों को है मूर्ख बनाते ।।
भोंदू राम भी यही थे करते,
जब भी कोई जन थे मरते।
श्राद्ध-कर्म करवाने जाते,
झूठ-मूठ दक्षिणा चढ़वाते।।
बाछी बेचने जब गए बाजार,
खुला भेद फिर खाए मार ।
बोले हम केवल जन को भरमाते,
इसी से हैं हम जीते-खाते।।
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