इन बूढ़ी आँखों के सम्मुख,
जो गुजरा कुछ आज तलक।
नेत्र पटल पर अब भी अंकित हैं,
उठा छलक उठे जब खुला पलक।।
पढ़ सकते तो पढ़ लो प्यारे,
क्या कहती झुर्रियां चेहरे की।
कोटिशः झंझावात हार गए,
ठान ली जब भीखुश रहने की।
– संजय कुमार गुप्त ‘अबोध’
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