नदियों को तुम स्वच्छ रखो,
इनमें कचड़ा ना डालो।
झींगा,केकड़ा,मछली,कछुआ
जितना चाहो पलो ।।
पशुओं को ना धोओ इनमें,
कपड़े करो साफ ।
गंदा करे जो इन नदियों को,
कभी ना करता ईश्वर माफ़।।
इन नदियों में छोटे-बड़े,
अगड़ित जीव हैं रहते ।
हम मानव की गलती से,
कितने दुःख वे सहते।।
इन नदियों का जल पीकर,
पशु बुझाते प्यास ।
गर्मी से आकुल खग-कुल का
यही है अंतिम आस।।
फसल सींचते मीठे जल से,
कृषक अनेक-अनेक।
कुछ लोग करते गंदा इनको
कूड़े-कचड़े फेंक ।।
कह अबोध करते स्नान,
साधू, संत, फकीर।
मुड़कर पीछे देख लो,
तुलसी, सूर, कबीर ।।
थे कृष्ण नहाते यमुना जी में,
सरयू में रघुबीर ।
हरिश्चंद्र ने गंगा तट पर,
माँगा पत्नी से चीर ।
गंगा जी के पावन जल में,
खूब नहाते भोले ।
संगम पर गंगा, यमुना के
आ सभी पाप धो ले ।।
सतलज, रावी, चिनाव, वितस्ता,
कृष्णा और कावेरी ।
झट से सीखो इनके नाम,
करो ना तुम अब देरी ।।
झेलम, क्षिप्रा, सिंधु, घाघरा
ब्रह्मपुत्र और कोसी ।
परोपकार हैं जग का करतीं,
जन के पाप भी धोती ।।
मृदुजल पीकर अंजलि भर,
पथिक तृप्त हो जाते।
तट पर इनके ऋषि-मुनि,
सुधि-बुद्धि हैं खो जाते ।।
करें प्रतिज्ञा हम अबोध,
स्वच्छ रखेंगे इनको ।
जो भी कचड़ा डाले इनमें,
मिल समझाएंगे उनको।।
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