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मूर्ति कुछ प्रतिक्रिया न करता

                
                                                         
                            मम्मी जरा इधर भी देखो,
                                                                 
                            
माँग रहे ये कैसे भीख ।
बैठे हैं ये पंक्ति बनाये,
रहे हैं इनके बच्चे चीख।।

कपड़े बिलकुल फटे–पुराने,
पकड़े हाथ कटोरे ।
लोग फेंकते जो भी कुछ,
ये कैसे उन्हें बटोरे ।।

क्यों मांगते ये लोग भीख?
मम्मी मुझे बताओ न !
हाथ फैलाया है वह बालक,
पैसे दे उसे हटाओ न।।

बेटा! यह लोग बहुत गरीब हैं,
दाने-दाने को मोहताज ।
तन ढकने को वस्त्र नहीं,
खुदा बचाए इनकी लाज।।

इन्हें गरीब बनाया किसने ?
जब ये भी ईश्वर की संतान।
मम्मी! यह तो अन्याय है,
ये जियेंगे कैसे सीना तान ।।

बेटा! यह कुदरत की लीला,
जिसे कोई समझ ना पाया ।
कब, कैसे, क्यों, किसको, कैसा
किसके लिए बनाया ।।

मम्मी मंदिर में कुछ लोग,
दान चढाते कितना ।
इन गरीबों का पेट भरे,
क्यों देते न इनको इतना।।

मंदिर में चढ़ाने से बेहतर,
इन दुखियों को देना है ।
मदद करना इन असहयों का,
उनके दुःख को लेना है।।

पत्थर की मूर्ति से अच्छे,
ये भगवान हमारे हैं ।
देखो न! कुछ पाने खातिर,
कैसे हाथ पसारे हैं ।।

मूर्ति कुछ प्रतिक्रिया न करता,
चाहे कितना प्रसाद चढ़ावें।
एक-दो रुपए पाकर भी, यह
आशीर्वाद को हाथ बढ़ावें।।

देते लाख दुआएं ये,
एक रुपए के बदले ।
पर मानव कितना अबोध,
मुँह फेर, बढ़ ले।।
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44 मिनट पहले

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