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सूख जाते हम बच्चों के तन।।

                
                                                         
                            गर्मी में जब लू चलता है,
                                                                 
                            
सूख जाते हैं खेत,बाग,वन।
सूख जाती धरती की दूब,
सूख जाते हम बच्चों के तन।।

गर्म हवा के झोंके संग
चलती है जब लू ।
गर्द चिंगारी बन जाता,
है तपने लगती भू ।

स्वांस लेना कठिन हो जाता,
होता तन पसीने से तर ।
दुर्बल जीव-जंतु और मानव,
जाते कितने तड़प के मर ।।

आग कहीं जब लग जाती,
जलते गाँव के गाँव ।
नीड उजड़ जाता है जिनका,
मिलता उनको कहीं न ठाव ।।

लोग तड़पते, मिले कहीं भी
एक टुकड़ा भी छाँव ।
पशु-पक्षी पानी को व्याकुल,
कौवे करते दिन भर काँव ।।

इन अबोध पशुओं पर प्रभु !
तरस थोड़ा सा खाओ ।
बंद करो अब आतप ढाना,
कुछ ठण्डे जल बरसाओ।।
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54 मिनट पहले

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