सन सोलह की गर्मी देखो,
चलती दिन भर लू ।
अभी महीना अप्रैल है,
पर फटने लगी है भू ।।
दिन भर चलती गर्म हवाएं,
करती सनन-सनन ।
यह अद्भुत परिवर्तन क्यों?
करना होगा हमें मनन ।।
पाप बहुत बढ़ चला है जग में,
हुई रुष्ट अब प्रकृति ।
नर से नर निशिचर बना,
क्यों बदल गई प्रवृत्ति ?
रोष प्रकट करती है प्रकृति,
आपदाओं के रूप में ।
कभी डूबते पानी में नर,
और कभी तड़पते धूप में ।।
छेड़छाड़ मत करो प्रकृति से,
स्वाभाविक अपना कर्म करो।
मत करो अधिक अत्याचार,
अब तो थोड़ा शर्म करो ।।
हे नियति ! ये नर ‘अबोध’
अज्ञानी, पापी, नश्वर हैं ।
क्षमा करो इनके अपराध,
रचा इन्हें जगदीश्वर है ।।
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