बेटी का दर्द
ये दुनिया, ये रिश्ते-नाते,
क्या ये हमको यही बताते?
क्यों अपने हमको ठुकराते,
हमें देख क्यों न मुस्कुराते?
बेटी होने का कैसा भाग्य,
क्या बेटी होना ही है अभाग्य?
नहीं कोई सुख क्यों हुआ है नसीब,
हमसे हुआ है कौन-सा पाप?
–– संजय कुमार गुप्त ‘अबोध’
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