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परिजन का भी जीवन नष्ट।।

                
                                                         
                            अस्पताल में होती हैं,
                                                                 
                            
विविध मरीजों की सेवा।
पुण्य कमाते नर्स व डॉक्टर,
मिले दुआओं की मेवा ।।

कितने डॉक्टर और नर्सें,
इन अस्पतालों में रहते ।
दिन-रात मरीजों की सेवा,
पूरे मन से करते ।।

जब कोई बीमार हो जाता,
अस्पताल तब ही वह जाता।
होती दवा वहाँ पर उसकी,
ठीक-ठाक हो घर को आता।।

चेकअप करके डॉक्टर उनको,
देता सही सटीक दवा ।
कुछ दवाई मीठी होतीं,
कुछ होतीं कड़वा ।।

देखभाल करती हैं नर्सें,
बिस्तर पर जो पड़े मरीज।
उनकी भी देखरेख वे करतीं,
जो हैं निर्बल और गरीब ।।

कह अबोध निर्धन को देना,
दवा व रोटी दाल ।
हाल-चाल दुखियों का लेना,
जाकर के तुम अस्पताल।।

अस्पताल में दिखते हैं,
चारों ओर मरीज ।
दवा को कैसे तड़प रहे,
निर्बल और गरीब ।।

किसी की टांगे कटी हुई,
किसी के सर पर है पट्टी।
कोई करता दिन भर उल्टी,
तो कोई बेड पर सू-सू टट्टी।।

कैसे-कैसे दुःखों के मारे,
कहाँ से आए यह बेचारे ।
कितना जटिल जीवन जीते,
कैसे यह यहाँ खाते-पीते।।

इनके संग इनके परिजन भी,
कितनी जिल्लत झेल रहे।
उधर सुखी वह पैसे वाले,
क्या मस्ती से खेल रहे ।

हे ईश्वर ! क्यों देता है,
दीन-हीन को कष्ट ।
मरीज के संग हो जाता,
परिजन का भी जीवन नष्ट।।

हे रब! इनके कष्ट हरो,
ये अबोध तेरे बच्चे ।
इनके बदले मुझे सताओ,
हो जाएं यह सब अच्छे ।।
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43 minutes ago

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